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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 52: भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना
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श्लोक 8
श्लोक
3.52.8
योऽसौ गच्छति धर्मात्मा बहून् क्लेशान् विचिन्तयन्।
भवन्नियोगाद् बीभत्सुस्ततो दु:खतरं नु किम्॥ ८॥
अनुवाद
'धर्मात्मा अर्जुन जो नाना प्रकार के दुःखों का चिन्तन करते हुए आपकी आज्ञा से तपस्या के लिए गए, उनसे अधिक दुःखदायक और क्या हो सकता है?॥8॥
'What could be more painful than the righteous Arjuna who, while contemplating upon various kinds of sufferings, went for penance at your command?॥ 8॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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