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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 52: भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.52.6 
निदेशात् ते महाराज गतोऽसौ भरतर्षभ:।
अर्जुन: पाण्डुपुत्राणां यस्मिन् प्राणा: प्रतिष्ठिता:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
महाराज! आपकी आज्ञा से भरतवंश के रत्न अर्जुन तपस्या के लिए चले गए हैं। हम सभी पाण्डवों के प्राण उनमें बसते हैं।
 
‘Maharaj! With your permission, Arjuna, the jewel of the Bharata dynasty, has gone for penance. The life of all of us Pandavas resides in him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)