श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 52: भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना  »  श्लोक 46-47
 
 
श्लोक  3.52.46-47 
अहं वने दुर्वसतीर्वसन् परमदु:खित:।
अक्षद्यूताधिकारे च गिर: शृण्वन् सुदारुणा:॥ ४६॥
आर्तानां सुहृदां वाचो द्यूतप्रभृति शंसताम्।
अहं हृदि श्रिता: स्मृत्वा सर्वरात्रीर्विचिन्तयन्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
'मैं अत्यन्त दुःखी होकर बड़ी कठिनाई से वन में रह रहा हूँ। जिस सभा में जुआ खेला जा रहा था, वहाँ मुझे विरोधी पुरुषों के मुख से अत्यन्त कठोर वचन सुनने पड़े थे। इसके अतिरिक्त मेरे दुःखी मित्रों ने जुआ आदि कार्यों का उल्लेख करते हुए जो दुःखद वचन कहे हैं, वे सब मेरे हृदय में विद्यमान हैं। इन सब बातों का स्मरण करते हुए मैं रात भर चिंता में डूबा रहता हूँ। ॥46-47॥
 
'I am living in the forest with great difficulty, being very sad. In the gathering where gambling was organized, I had to listen to very harsh words from the mouth of the opposing men. Apart from this, all the sorrowful words that my sorrowful friends have said while referring to the activities like gambling etc. are present in my heart. Remembering all these things, I remain immersed in worry throughout the night. ॥ 46-47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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