श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 52: भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  3.52.43 
अक्षद्यूते च भगवन् धनं राज्यं च मे हृतम्।
आहूय निकृतिप्रज्ञै: कितवैरक्षकोविदै:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! मुझे पासा खेलने के लिए बुलाकर छल-कपट में निपुण और पासा फेंकने की कला में निपुण उन धूर्त जुआरियों ने मेरा सारा धन और राज्य हर लिया है ॥ 43॥
 
'O Lord! Having called me for a game of dice, the cunning gamblers, skilled in deceit and expert in the art of casting the dice, have kidnapped all my wealth and kingdom. ॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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