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mahabharat 3.52.34-35: मेरा निश्चय है कि छल करने वाले को छल से ही मारना चाहिए। यदि आपकी अनुमति हो, तो जैसे घास के ढेर में डाली गई आग वायु के वेग से उसे भस्म कर देती है, उसी प्रकार मैं भी उस मूर्ख दुर्योधन को यथाशक्ति जाकर मार डालूँ। अतः मुझे अनुमति दीजिए।   |   mahabharat अध्याय 3.52: भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 52: भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  3.52.34-35 
निकृत्या निकृतिप्रज्ञो हन्तव्य इति निश्चय:।
अनुज्ञातस्त्वया गत्वा यावच्छक्ति सुयोधनम्॥ ३४॥
यथैव कक्षमुत्सृष्टो दहेदनिलसारथि:।
हनिष्यामि तथा मन्दमनुजानातु मे भवान्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
मेरा निश्चय है कि छल करने वाले को छल से ही मारना चाहिए। यदि आपकी अनुमति हो, तो जैसे घास के ढेर में डाली गई आग वायु के वेग से उसे भस्म कर देती है, उसी प्रकार मैं भी उस मूर्ख दुर्योधन को यथाशक्ति जाकर मार डालूँ। अतः मुझे अनुमति दीजिए।
 
‘My determination is that a deceitful person should be killed by deceit only. If you permit, then just as fire thrown into a pile of grass consumes it with the help of wind, in the same way I should go and kill that foolish Duryodhan to the best of my abilities. So please give me permission.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)