श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 52: भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.52.33 
यद्यस्मान् सुमहाराज कृपणान् कर्तुमर्हसि।
यावज्जीवमवेक्षस्व वेदधर्मांश्च कृत्स्नश:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
"महाराज! यदि आप हमें दरिद्र, दीन और कृपण बनाना चाहते हैं, तो जब तक जीवित रहें, तब तक समस्त वैदिक धर्मों के पालन में मन लगाएँ ॥ 33॥
 
"Maharaj! If you wish to make us poor, lowly and miserly, then as long as you live, focus on following all the Vedic Dharmas. ॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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