श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 52: भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.52.31 
द्यूतेन ते महाराज पुनर्द्यूतमवर्तत।
भवांश्च पुनराहूतो द्यूते नैवापनेष्यति॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'महाराज! एक बार जुए के खतरे से बचकर आप पुनः जुए में लग गए, अतः मैं समझता हूँ कि यदि आपको पुनः जुआ खेलने के लिए बुलाया जाए, तो आप उससे पीछे नहीं हटेंगे ॥31॥
 
'Maharaj! After escaping from the danger of gambling once, you again got involved in gambling, so I understand that if you are called upon to gamble again, you will not back out from it. ॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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