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श्लोक 3.52.28-29  |
न तं देशं प्रपश्यामि यत्र सोऽस्मान् सुदुर्जन:।
न विज्ञास्यति दुष्टात्मा चारैरिति सुयोधन:॥ २८॥
अधिगम्य च सर्वान्नो वनवासमिमं तत:।
प्रव्राजयिष्यति पुनर्निकृत्याधमपूरुष:॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| मैं ऐसा कोई देश या स्थान नहीं देखता जहाँ अत्यन्त दुष्ट और दुष्ट दुर्योधन अपने गुप्तचरों द्वारा हमारा पता न लगा ले और हमारा गुप्त निवास जानकर वह नीच दुष्ट अपनी छल-नीति से हमें पुनः वनवास में भेज दे॥ 28-29॥ |
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| ‘I do not see any country or place where the extremely evil-minded and wicked Duryodhan will not find out our whereabouts through his spies. After knowing our secret abode, that vile wretch will again send us into this exile through his deceitful policy.॥ 28-29॥ |
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