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श्लोक 3.52.27  |
द्यूतप्रियेण राजेन्द्र तथा तद् भवता कृतम्।
प्रायेणाज्ञातचर्यायां वयं सर्वे निपातिता:॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| 'राजेन्द्र! तुमने द्यूतक्रीड़ा में मग्न होकर इतनी बड़ी विपत्ति उत्पन्न कर दी कि हम सब को वनवास के कष्ट में डाल दिया॥ 27॥ |
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| 'Rajendra! Being engrossed in the game of gambling you caused such a great misfortune that you almost threw all of us into the trouble of exile.॥ 27॥ |
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