श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 52: भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.52.20 
यज्ञैश्च विविधैस्तात कृतं पापमरिंदम।
अवधूय महाराज गच्छेम स्वर्गमुत्तमम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! शत्रुनाशक! महाराज! नाना प्रकार के यज्ञ करके और अपने पापों को धोकर हम उत्तम स्वर्ग में जाएँगे।
 
'Father! Enemy-destroyer! Maharaj! After performing various types of sacrifices and washing away our sins, we shall go to the best heaven.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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