श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 52: भीमसेन-युधिष्ठिर-संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.52.14 
क्षात्रं धर्मं महाराज त्वमवेक्षितुमर्हसि।
न हि धर्मो महाराज क्षत्रियस्य वनाश्रय:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
महाराज! कृपया क्षत्रियधर्म पर ध्यान दीजिए। इस प्रकार वन में रहना क्षत्रियों का धर्म नहीं है॥14॥
 
‘Maharaj! Please look at the kshatriyadharma. Living in the forest like this is not the dharma of kshatriyas.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)