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श्लोक 3.51.46  |
मन्ये तथा तद् भवितेति सूत
यथा क्षत्ता प्राह वच: पुरा माम्।
असंशयं भविता युद्धमेतद्
गते काले पाण्डवानां यथोक्तम्॥ ४६॥ |
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| अनुवाद |
| सूत! मुझे विश्वास है कि विदुर ने जो कुछ पहले कहा था, वैसा ही अवश्य होगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि वनवास की अवधि समाप्त होने पर पाण्डवों के कथनानुसार यह घोर युद्ध अवश्य होगा॥ 46॥ |
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| Suta! I am sure that whatever Vidura had said earlier will definitely happen in the same way. There is no doubt that after the period of exile is over, this fierce war will definitely take place as per the words of the Pandavas. ॥ 46॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि धृतराष्ट्र्रविलापे एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें धृतराष्ट्रविलापविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५१॥
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