श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 51: संजयका धृतराष्ट्रके प्रति श्रीकृष्णादिके द्वारा की हुई दुर्योधनादिके वधकी प्रतिज्ञाका वृत्तान्त सुनाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.51.15 
संजय उवाच
व्यतिक्रमोऽयं सुमहांस्त्वया राजन्नुपेक्षित:।
समर्थेनापि यन्मोहात् पुत्रस्ते न निवारित:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
संजय ने कहा, "हे राजन! आपने जान-बूझकर अपने द्वारा किए गए इस महान अन्याय की उपेक्षा की है। समर्थ होते हुए भी आपने मोहवश अपने पुत्र को नहीं रोका।"
 
Sanjaya said, 'O King! You have deliberately ignored this great injustice which you have done. Despite being capable, you did not stop your son due to attachment.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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