श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 50: वनमें पाण्डवोंका आहार  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.50.7 
रुरून् कृष्णमृगांश्चैव मेध्यांश्चान्यान् वनेचरान्।
बाणैरुन्मथ्य विविधैर्ब्राह्मणेभ्यो न्यवेदयत्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वह विविध बाणों से मृग, काले मृग तथा अन्य पवित्र वन्य पशुओं को मारकर उनकी खालें ब्राह्मणों को देकर उनके आसन बनाता था॥7॥
 
He used to kill deer, black deer and other sacred wild animals with various arrows and offer their skins to the Brahmins to make their seats. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)