Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.50.4: वैशम्पायन जी बोले - हे राजन! पुरुषोत्तम पाण्डव लोग जंगली फल-मूल तथा खेती से उत्पन्न अन्न को पहले ब्राह्मणों को अर्पित करते थे, फिर स्वयं खाते थे। तथा सबकी रक्षा के लिए वे अपने बाणों से ही जंगली पशुओं का वध कर देते थे।   |   mahabharat अध्याय 3.50: वनमें पाण्डवोंका आहार   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 50: वनमें पाण्डवोंका आहार  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.50.4 
वैशम्पायन उवाच
वानेयांश्च मृगांश्चैव शुद्धैर्बाणैर्निपातितान्।
ब्राह्मणानां निवेद्याग्रमभुञ्जन् पुरुषर्षभा:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन जी बोले - हे राजन! पुरुषोत्तम पाण्डव लोग जंगली फल-मूल तथा खेती से उत्पन्न अन्न को पहले ब्राह्मणों को अर्पित करते थे, फिर स्वयं खाते थे। तथा सबकी रक्षा के लिए वे अपने बाणों से ही जंगली पशुओं का वध कर देते थे।
 
Vaishmpayana said - O King! The best of men, the Pandavas, used to first offer the wild fruits and roots and the food grains produced by farming to the Brahmins and then eat them themselves. And for the protection of everyone, they used to kill the wild animals only with their arrows.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)