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श्लोक 3.5.22  |
युधिष्ठिर उवाच
एवं करिष्यामि यथा ब्रवीषि
परां बुद्धिमुपगम्याप्रमत्त:।
यच्चाप्यन्यद्देशकालोपपन्नं
तद् वै वाच्यं तत् करिष्यामि कृत्स्नम्॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| युधिष्ठिर ने कहा - विदुर जी! मैं सद्बुद्धि का आश्रय लेकर और सदैव सावधान रहकर आपके कहे अनुसार ही कार्य करूँगा। साथ ही देश और काल के अनुसार जो भी कर्तव्य आप उचित समझें, वह भी मुझे बताइए। मैं उसका पूर्णतः पालन करूँगा॥ 22॥ |
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| Yudhishthira said - Vidura ji! I will do as you say by taking shelter of good wisdom and being always cautious. Also tell me whatever duty you consider appropriate according to place and time. I will follow it completely.॥ 22॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरनिर्वासे पञ्चमोऽध्याय:॥ ५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें विदुरनिर्वासनविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५॥
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