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mahabharat 3.5.20: महाराज! जिसका धन उसके सहायकों में बँटता नहीं; अर्थात् जिसके धन का उपभोग उसके सहायक अपना समझकर करते हैं, उसके दुःख में सभी लोग भागीदार होते हैं। सहायकों को एकत्रित करने का यही एकमात्र उपाय है। कहते हैं कि सहायक मिल जाएँ तो सारा संसार मिल जाता है।   |   mahabharat अध्याय 3.5: पाण्डवोंका काम्यकवनमें प्रवेश और विदुरजीका वहाँ जाकर उनसे मिलना और बातचीत करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 5: पाण्डवोंका काम्यकवनमें प्रवेश और विदुरजीका वहाँ जाकर उनसे मिलना और बातचीत करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.5.20 
यस्याविभक्तं वसु राजन् सहायै-
स्तस्य दु:खेऽप्यंशभाज: सहाया:।
सहायानामेष संग्रहणेऽध्युपाय:
सहायाप्तौ पृथिवीप्राप्तिमाहु:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
महाराज! जिसका धन उसके सहायकों में बँटता नहीं; अर्थात् जिसके धन का उपभोग उसके सहायक अपना समझकर करते हैं, उसके दुःख में सभी लोग भागीदार होते हैं। सहायकों को एकत्रित करने का यही एकमात्र उपाय है। कहते हैं कि सहायक मिल जाएँ तो सारा संसार मिल जाता है।
 
King! One whose wealth is not divided among his helpers; that is, one whose wealth is enjoyed by his helpers as their own, all of them share his sorrows as well. This is the only way to collect helpers. It is said that when one gets helpers, one gets the whole world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)