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श्लोक 3.5.18  |
सोऽहं त्यक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा
प्रशासितुं त्वामुपयातो नरेन्द्र।
तद् वै सर्वं यन्मयोक्तं सभायां
तद् धार्यतां यत् प्रवक्ष्यामि भूय:॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| हे नरेन्द्र! राजा धृतराष्ट्र ने मुझे इस प्रकार त्याग दिया है; इसलिए मैं तुम्हें उपदेश देने आया हूँ। मैंने सभा में जो कुछ कहा था और इस समय जो कुछ पुनः कह रहा हूँ, उसे तुम स्मरण रखो॥ 18॥ |
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| O Narendra! King Dhritarashtra has thus forsaken me; therefore I have come to give you advice. Whatever I had said in the assembly and whatever I am saying again at this time, you should keep that in mind.॥ 18॥ |
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