श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 5: पाण्डवोंका काम्यकवनमें प्रवेश और विदुरजीका वहाँ जाकर उनसे मिलना और बातचीत करना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.5.16 
ध्रुवं विनाशो नृप कौरवाणां
न वै श्रेयो धृतराष्ट्र: परैति।
यथा च पर्णे पुष्करस्यावसिक्तं
जलं न तिष्ठेत् पथ्यमुक्तं तथास्मिन्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! राजा धृतराष्ट्र कल्याणकारी उपाय नहीं अपनाते, इसलिए कौरव कुल का नाश अवश्यंभावी प्रतीत होता है। जैसे कमल के पत्ते पर डाला हुआ जल ठहरता नहीं, वैसे ही कहे हुए हितकर वचन राजा धृतराष्ट्र के मन में स्थान नहीं पाते॥16॥
 
O King! King Dhritarashtra does not adopt welfare measures, therefore it seems certain that the destruction of the Kaurava clan is inevitable. Just as water poured on a lotus leaf does not stay, similarly the beneficial words spoken do not find a place in the mind of King Dhritarashtra.॥ 16॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas