श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 5: पाण्डवोंका काम्यकवनमें प्रवेश और विदुरजीका वहाँ जाकर उनसे मिलना और बातचीत करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.5.12 
विदुर उवाच
अवोचन्मां धृतराष्ट्रोऽनुगुप्त-
मजातशत्रो परिगृह्याभिपूज्य।
एवं गते समतामभ्युपेत्य
पथ्यं तेषां मम चैव ब्रवीहि॥ १२॥
 
 
अनुवाद
विदुर जी बोले- अजातशत्रु! राजा धृतराष्ट्र ने मुझे अपना रक्षक कहकर आदरपूर्वक कहा- 'विदुर! आज की परिस्थिति में समता रखते हुए कोई ऐसा उपाय बताइए, जो मेरे और पाण्डवों के लिए हितकर हो।'॥12॥
 
Vidur ji said- Ajatashatro! King Dhritarashtra called me as his protector and said with respect- 'Vidur! In today's situation, keeping equanimity, tell me a solution that will be beneficial for me and the Pandavas.'॥ 12॥
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