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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 5: पाण्डवोंका काम्यकवनमें प्रवेश और विदुरजीका वहाँ जाकर उनसे मिलना और बातचीत करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.5.1 
वैशम्पायन उवाच
पाण्डवास्तु वने वासमुद्दिश्य भरतर्षभा:।
प्रययुर्जाह्नवीकूलात् कुरुक्षेत्रं सहानुगा:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन जी कहते हैं: जनमेजय! भरतवंश के रत्न पाण्डव अपने साथियों के साथ वनवास के लिए गंगा तट से कुरुक्षेत्र की ओर चले।
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! The Pandavas, the jewels of the Bharata dynasty, went to Kurukshetra from the banks of the Ganges along with their companions for their exile.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)