श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 48: दु:खित धृतराष्ट्रका संजयके सम्मुख अपने पुत्रोंके लिये चिन्ता करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.48.18 
यदोद्वहन् प्रवपंश्चैव बाणान्
स्थाताऽऽततायी समरे किरीटी।
सृष्टोऽन्तक: सर्वहरो विधात्रा
भवेद् यथा तद्वदपारणीय:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जब किरीटधारी अर्जुन युद्धभूमि में खड़े होकर, हाथों में शस्त्र लेकर और तरकश से बाण छोड़ते हुए खड़े होंगे, तब उन्हें पराजित करना असम्भव होगा। वे ऐसे प्रतीत होंगे मानो विधाता ने दूसरा सर्वनाश करने वाला यमराज उत्पन्न कर दिया हो॥18॥
 
When Arjuna, wearing a crown, will stand in the battlefield, holding weapons in his hands and shooting arrows (from his quiver), it will be impossible to defeat him. He will appear as if the Creator has created another all-destroying Yamraj.॥ 18॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि धृतराष्ट्रविलापेऽष्टचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें धृतराष्ट्रविलापविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)