श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 48: दु:खित धृतराष्ट्रका संजयके सम्मुख अपने पुत्रोंके लिये चिन्ता करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.48.17 
अपि तद्रथघोषेण भयार्ता सव्यसाचिन:।
प्रतिभाति विदीर्णेव सर्वतो भारती चमू:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
आज भी मैं सव्यसाची अर्जुन के रथ की गड़गड़ाहट से समस्त कौरव सेना को भयभीत और टुकड़े-टुकड़े होते हुए देख सकता हूँ।
 
Even today I can see the entire Kaurava army being frightened and torn to pieces by the rumbling sound of Savyasachi Arjun's chariot.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)