श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 48: दु:खित धृतराष्ट्रका संजयके सम्मुख अपने पुत्रोंके लिये चिन्ता करना  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  3.48.10-11 
घृणी कर्ण: प्रमादी च आचार्य: स्थविरो गुरु:।
अमर्षी बलवान् पार्थ: संरम्भी दृढविक्रम:॥ १०॥
सम्भवेत् तुमुलं युद्धं सर्वशोऽप्यपराजितम्।
सर्वे ह्यस्त्रविद: शूरा: सर्वे प्राप्ता महद् यश:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
कर्ण दयालु और लापरवाह है। द्रोण वृद्ध और गुरु हैं। दूसरी ओर, कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यंत क्रोधी और बलवान है। वह परिश्रमी और महान् वीर है। चारों ओर से भयंकर युद्ध छिड़ने की संभावना है। पांडव युद्ध में पराजित नहीं हो सकते; क्योंकि उनके पक्ष में सभी योद्धा, अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण और महान् यशस्वी हैं॥10-11॥
 
Karna is kind and careless. Drona is old and a teacher. On the other hand, Arjun, the son of Kunti, is very angry and strong. He is industrious and has great courage. There is a possibility of a fierce battle breaking out from all sides. The Pandavas cannot be defeated in the war; because on their side are all the warriors, experts in the art of weapons and are very famous.॥ 10-11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)