श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 47: लोमश मुनिका स्वर्गमें इन्द्र और अर्जुनसे मिलकर उनका संदेश ले काम्यकवनमें आना  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  3.47.8-9 
महर्षे मम पुत्रोऽयं कुन्त्यां जातो महाभुज:।
अस्त्रहेतोरिह प्राप्त: कस्माच्चित् कारणान्तरात्॥ ८॥
अहो नैनं भवान् वेत्ति पुराणमृषिसत्तमम्।
शृणु मे वदतो ब्रह्मन् योऽयं यच्चास्य कारणम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
महर्षि! यह महाबाहु धनंजय कुन्ती के गर्भ से उत्पन्न मेरा ही पुत्र है और किसी कारणवश शस्त्रविद्या सीखने के लिए यहाँ आया है। आश्चर्य है कि आप इस प्राचीन ऋषि को नहीं जानते। ब्रह्मन्! मैं आपको इसका स्वरूप और इसके अवतार का कारण बता रहा हूँ। कृपया यह सब मुझसे सुनिए। ॥8-9॥
 
‘Maharshi! This Mahabahu Dhananjaya is my son born from Kunti's womb and has come here for some reason to learn the art of weapons. It is surprising that you do not know this ancient sage. Brahman! I am telling you about his form and the reason for his incarnation. Please listen to all this from me. ॥ 8-9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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