श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 47: लोमश मुनिका स्वर्गमें इन्द्र और अर्जुनसे मिलकर उनका संदेश ले काम्यकवनमें आना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.47.4 
तस्य दृष्ट्वा भवद् बुद्धि: पार्थमिन्द्रासने स्थितम्।
कथं नु क्षत्रिय: पार्थ: शक्रासनमवाप्तवान्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीपुत्र अर्जुन को इन्द्र के सिंहासन पर बैठे देखकर लोमश ने सोचा, ‘कुन्तीपुत्र क्षत्रिय होकर भी इन्द्र का सिंहासन कैसे प्राप्त कर लिया?॥ 4॥
 
Seeing Arjuna, the son of Kunti, sitting on the throne of Indra, Lomasha thought, 'How did Kunti's son, despite being a Kshatriya, obtain Indra's throne?॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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