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mahabharat 3.47.35: वहाँ पहुँचकर उन्होंने शत्रु-विनाशक कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर को अपने भाइयों और तपस्वी ऋषियों से घिरे हुए देखा।   |   mahabharat अध्याय 3.47: लोमश मुनिका स्वर्गमें इन्द्र और अर्जुनसे मिलकर उनका संदेश ले काम्यकवनमें आना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 47: लोमश मुनिका स्वर्गमें इन्द्र और अर्जुनसे मिलकर उनका संदेश ले काम्यकवनमें आना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.47.35 
ददर्श तत्र कौन्तेयं धर्मराजमरिंदमम्।
तापसैर्भ्रातृभिश्चैव सर्वत: परिवारितम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वहाँ पहुँचकर उन्होंने शत्रु-विनाशक कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर को अपने भाइयों और तपस्वी ऋषियों से घिरे हुए देखा।
 
Reaching there he saw the enemy-destroyer, Kunti's son Dharmaraja Yudhishthira surrounded by his brothers and ascetic sages.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि लोमशगमने सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें लोमशगमनविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)