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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 47: लोमश मुनिका स्वर्गमें इन्द्र और अर्जुनसे मिलकर उनका संदेश ले काम्यकवनमें आना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.47.34 
वैशम्पायन उवाच
तथेति सम्प्रतिज्ञाय लोमश: सुमहातपा:।
काम्यकं वनमुद्दिश्य समुपायान्महीतलम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: 'जनमेजय!' 'बहुत अच्छा' कहकर महातपस्वी लोमशजी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और काम्यक वन में जाने के लिए पृथ्वी की ओर चल पड़े।
 
Vaishmpayana says: 'Janamejaya! Saying 'very good', the great ascetic Lomasha accepted his request and proceeded towards the earth to go to Kamyaka forest.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)