श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 47: लोमश मुनिका स्वर्गमें इन्द्र और अर्जुनसे मिलकर उनका संदेश ले काम्यकवनमें आना  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  3.47.12-13 
यन्न शक्यं सुरैर्द्रष्टुमृषिभिर्वा महात्मभि:।
तदाश्रमपदं पुण्यं बदरीनाम विश्रुतम्॥ १२॥
स निवासोऽभवद् विप्र विष्णोर्जिष्णोस्तथैव च।
यत: प्रववृते गङ्गा सिद्धचारणसेविता॥ १३॥
 
 
अनुवाद
‘जिस पवित्र तीर्थ का आश्रम बद्री नाम से प्रसिद्ध है, जिसे देवता और महर्षि भी नहीं देख पाते, वही पूर्वकाल में श्रीकृष्ण और अर्जुन (नारायण और नरक) का निवास स्थान था। जहाँ से सिद्धचरणों द्वारा सेवित गंगाजी प्रकट हुई थीं॥12-13॥
 
‘The hermitage of that holy pilgrimage known as Badri, which even the Gods and the great sages are not able to see, was the abode of Shri Krishna and Arjun (Narayana and Naraka) in the past. From where the Ganges, served by the Siddha-charans, appeared.॥ 12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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