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श्लोक 3.46.63  |
इदममरवरात्मजस्य घोरं
शुचि चरितं विनिशम्य फाल्गुनस्य।
व्यपगतमददम्भरागदोषा-
स्त्रिदिवगता विरमन्ति मानवेन्द्रा:॥ ६३॥ |
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| अनुवाद |
| इन्द्रपुत्र अर्जुन के इस अत्यन्त कठिन एवं पवित्र चरित्र को सुनकर, जो श्रेष्ठ मनुष्य अहंकार, मद और काम आदि विकारों से रहित हैं, वे स्वर्गलोक में जाकर सुखपूर्वक निवास करते हैं ॥63॥ |
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| Hearing this extremely difficult and sacred character of Arjuna, the son of Lord Indra, the best human beings who are free from vices like pride, pride and lust etc. go to heaven and reside there happily. 63॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि उर्वशीशापो नाम षट्चत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें उर्वशीशाप नामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४६॥
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