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श्लोक 3.46.56-58  |
ऋषयोऽपि हि धैर्येण जिता वै ते महाभुज।
यत् तु दत्तवती शापमुर्वशी तव मानद॥ ५६॥
स चापि तेऽर्थकृत् तात साधकश्च भविष्यति॥ ५७॥
अज्ञातवासो वस्तव्यो भवद्भिर्भूतलेऽनघ।
वर्षे त्रयोदशे वीर तत्र त्वं क्षपयिष्यसि॥ ५८॥ |
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| अनुवाद |
| महाबाहु! तुमने अपने धैर्य (इन्द्रिय संयम) से ऋषियों को भी परास्त कर दिया है। माननीय! उर्वशी द्वारा दिया गया शाप तुम्हें अभीष्ट सिद्धि में सहायक होगा। अनघ! तुम्हें तेरहवें वर्ष तक पृथ्वी पर अज्ञातवास करना होगा। वीर! तुम उसी वर्ष उर्वशी द्वारा दिया गया शाप पूरा करोगे।॥ 56-58॥ |
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| ‘Mahabahu! You have defeated even the sages by your patience (control of senses). Honorable! The curse given to you by Urvashi will serve you to achieve your desired goal. Anagh! You will have to live incognito on the earth for the thirteenth year. Brave! You will complete the curse given by Urvashi in the same year.’॥ 56-58॥ |
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