श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 46: उर्वशीका कामपीड़ित होकर अर्जुनके पास जाना और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देकर लौट आना  »  श्लोक 52-53
 
 
श्लोक  3.46.52-53 
ततोऽर्जुनस्त्वरमाणश्चित्रसेनमरिंदम:।
सम्प्राप्य रजनीवृत्तं तदुर्वश्या यथातथम्॥ ५२॥
निवेदयामास तदा चित्रसेनाय पाण्डव:।
तत्र चैवं यथावृत्तं शापं चैव पुन: पुन:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर शत्रुओं का नाश करने वाले पाण्डुपुत्र अर्जुन बड़ी शीघ्रता से चित्रसेन के पास गए और उन्हें उर्वशी के साथ घटित हुई सारी घटना यथावत् सुना दी तथा उसके द्वारा शाप दिए जाने की बात भी बार-बार दोहराई ॥52-53॥
 
Thereafter, Arjuna, the son of Pandu, the destroyer of enemies, went to Chitrasena in great haste and narrated to him the entire incident that had happened with Urvashi that night, exactly as it happened. He also repeatedly repeated the matter of her cursing him. ॥ 52-53॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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