श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 46: उर्वशीका कामपीड़ित होकर अर्जुनके पास जाना और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देकर लौट आना  »  श्लोक 49-50
 
 
श्लोक  3.46.49-50 
उर्वश्युवाच
तव पित्राभ्यनुज्ञातां स्वयं च गृहमागताम्।
यस्मान्मां नाभिनन्देथा: कामबाणवशंगताम्॥ ४९॥
तस्मात् त्वं नर्तन: पार्थ स्त्रीमध्ये मानवर्जित:।
अपुमानिति विख्यात: षण्ढवद् विचरिष्यसि॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
उर्वशी बोली - अर्जुन! मैं तुम्हारे पिता इन्द्र की आज्ञा से स्वयं तुम्हारे घर आई हूँ और प्रेम के बाणों से घायल हो रही हूँ, फिर भी तुम मेरा सम्मान नहीं करते। अतः तुम्हें स्त्रियों के बीच नर्तक बनकर, बिना किसी सम्मान के रहना पड़ेगा। तुम नपुंसक कहलाओगे और तुम्हारा सम्पूर्ण आचरण नपुंसकों जैसा होगा ॥49-50॥
 
Urvashi said - Arjun! I came to your house myself on the orders of your father Indra and am being wounded by the arrows of love, yet you do not respect me. Therefore, you will have to live as a dancer among women, without any respect. You will be called an impotent and your entire behavior will be like that of eunuchs. ॥ 49-50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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