श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 46: उर्वशीका कामपीड़ित होकर अर्जुनके पास जाना और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देकर लौट आना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.46.36 
वैशम्पायन उवाच
तां तथा ब्रुवतीं श्रुत्वा भृशं लज्जाऽऽवृतोऽर्जुन:।
उवाच कर्णौ हस्ताभ्यां पिधाय त्रिदशालये॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! स्वर्ग में उर्वशी के ये वचन सुनकर अर्जुन अत्यन्त लज्जित हुआ और अपने कानों को हाथों से ढककर बोला -॥36॥
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing these words of Urvashi in the heaven, Arjuna felt very ashamed and covering his ears with his hands said -॥ 36॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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