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श्लोक 3.45.16  |
महेन्द्रस्य नियोगेन त्वत्त: सम्प्रणयेन च।
तस्य चाहं गुणौघेन फाल्गुने जातमन्मथा।
गच्छ त्वं हि यथाकाममागमिष्याम्यहं सुखम्॥ १६॥ |
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| अनुवाद |
| महेन्द्र की आज्ञा से, तुम्हारे प्रेमपूर्ण व्यवहार से तथा अर्जुन के धर्मसम्पन्न समुदाय से मुझमें उस पर काम उत्पन्न हो गया है। अतः अब तुम जाओ। मैं अपनी इच्छानुसार उचित समय पर प्रसन्नतापूर्वक उसके यहाँ आऊँगी। 16॥ |
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| 'By Mahendra's orders, by your loving behavior and by Arjuna's virtuous community, I have developed lust for her. So now you go. I will happily come to his place at the right time as per my wish. 16॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि चित्रसेनोर्वशीसंवादे पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें चित्रसेन-उर्वशीसंवादविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥
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