श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 45: चित्रसेन और उर्वशीका वार्तालाप  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.45.14 
एवमुक्ता स्मितं कृत्वा सम्मानं बहु मन्य च।
प्रत्युवाचोर्वशी प्रीता चित्रसेनमनिन्दिता॥ १४॥
 
 
अनुवाद
चित्रसेन के ऐसा कहने पर उर्वशी के अधरों पर मुस्कान फैल गई। उसने इस आदेश को अपने लिए महान सम्मान समझा। उस समय सुन्दरी उर्वशी अत्यंत प्रसन्न हुई और चित्रसेन से इस प्रकार बोली -॥14॥
 
When Chitrasen said this, a smile spread on Urvashi's lips. She considered this order as a great honour for herself. The beautiful Urvashi was very happy at that time and spoke to Chitrasen in this manner -॥ 14॥
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