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mahabharat 3.43.6: जो लोग यज्ञों में विघ्न डालते हैं, नीच हैं, शराबी हैं, व्यभिचारी हैं, मांसाहारी हैं और दुष्टात्मा हैं, वे किसी भी प्रकार से उस दिव्य लोक का दर्शन नहीं कर सकते ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 3.43: अर्जुनद्वारा देवराज इन्द्रका दर्शन तथा इन्द्रसभामें उनका स्वागत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 43: अर्जुनद्वारा देवराज इन्द्रका दर्शन तथा इन्द्रसभामें उनका स्वागत  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.43.6 
नापि यज्ञहनै: क्षुद्रैर्द्रष्टुं शक्य: कथंचन।
पानपैर्गुरुतल्पैश्च मांसादैर्वा दुरात्मभि:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो लोग यज्ञों में विघ्न डालते हैं, नीच हैं, शराबी हैं, व्यभिचारी हैं, मांसाहारी हैं और दुष्टात्मा हैं, वे किसी भी प्रकार से उस दिव्य लोक का दर्शन नहीं कर सकते ॥6॥
 
Those who create obstacles in Yagyas, are mean, drunkards, adulterers, non-vegetarians and evil spirits, they cannot in any way get the darshan of that divine world. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)