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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 43: अर्जुनद्वारा देवराज इन्द्रका दर्शन तथा इन्द्रसभामें उनका स्वागत  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.43.2 
तत्र सौगन्धिकानां च पुष्पाणां पुण्यगन्धिनाम्।
उद्वीज्यमानो मिश्रेण वायुना पुण्यगन्धिना॥ २॥
 
 
अनुवाद
वहाँ सुगन्धित कमल और अन्य पवित्र पुष्पों की पवित्र गंध से मिश्रित वायु उस पात्र को हिलाती हुई प्रतीत हो रही थी।
 
There, the air mixed with the sacred smell of the fragrant lotus and other flowers with sacred smells seemed to be swaying the vessel. 2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)