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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 43: अर्जुनद्वारा देवराज इन्द्रका दर्शन तथा इन्द्रसभामें उनका स्वागत  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  3.43.11-12 
आशीर्वादै: स्तूयमानो दिव्यवादित्रनि:स्वनै:।
प्रतिपेदे महाबाहु: शङ्खदुन्दुभिनादितम्॥ ११॥
नक्षत्रमार्गं विपुलं सुरवीथीति विश्रुतम्।
इन्द्राज्ञया ययौ पार्थ: स्तूयमान: समन्तत:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
कहीं उन्हें आशीर्वाद मिल रहा था तो कहीं उनकी प्रशंसा हो रही थी। अनेक स्थानों पर दिव्य वाद्यों की मधुर ध्वनि से उनका स्वागत हो रहा था। इस प्रकार पराक्रमी अर्जुन शंखों और नगाड़ों की गम्भीर ध्वनि से गुंजायमान, 'सुरवीति' नामक विस्तृत तारा-पथ पर चलने लगे। इन्द्र की आज्ञा से कुन्तीकुमार की सर्वत्र प्रशंसा हो रही थी और इस प्रकार वे अपने गंतव्य पथ पर आगे बढ़ रहे थे। 11-12
 
At some places he was getting blessings and at other places he was receiving praises. At many places he was welcomed by the sweet sound of divine musical instruments. Thus, the powerful Arjuna started walking on the wide star-path known as 'Suraveethi', resonating with the deep sound of conches and drums. By the order of Indra, Kuntikumar was being praised everywhere and thus he was moving ahead on the path to his destination. 11-12.
 
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