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mahabharat 3.42.6: उस स्थान पर भयंकर और प्रज्वलित मुख वाले विशाल सर्प थे। श्वेत मेघों के समान युद्ध में फेंके जाने योग्य पत्थरों के ढेर भी वहाँ थे।   |   mahabharat अध्याय 3.42: अर्जुनका हिमालयसे विदा होकर मातलिके साथ स्वर्गलोकको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 42: अर्जुनका हिमालयसे विदा होकर मातलिके साथ स्वर्गलोकको प्रस्थान  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.42.6 
तत्र नागा महाकाया ज्वलितास्या: सुदारुणा:।
सिताभ्रकूटप्रतिमा: संहताश्च तथोपला:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उस स्थान पर भयंकर और प्रज्वलित मुख वाले विशाल सर्प थे। श्वेत मेघों के समान युद्ध में फेंके जाने योग्य पत्थरों के ढेर भी वहाँ थे।
 
There were huge serpents with fierce and blazing faces at that place. Like a mass of white clouds, there were also heaps of stones suitable for throwing in war. 6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)