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mahabharat 3.41.4: आज मैं अपने को अत्यंत तृप्त मानता हूँ और मुझे विश्वास है कि इस महायुद्ध में मैं अपने समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करूँगा। अब मेरा अभीष्ट उद्देश्य पूर्ण हो गया है॥4॥   |   mahabharat अध्याय 3.41: अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र-प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 41: अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र-प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.41.4 
कृतार्थं चावगच्छामि परमात्मानमाहवे।
शत्रूंश्च विजितान् सर्वान्निर्वृत्तं च प्रयोजनम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
आज मैं अपने को अत्यंत तृप्त मानता हूँ और मुझे विश्वास है कि इस महायुद्ध में मैं अपने समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करूँगा। अब मेरा अभीष्ट उद्देश्य पूर्ण हो गया है॥4॥
 
Today I consider myself extremely fulfilled and I am confident that I shall be victorious over all my enemies in this great war. Now my desired purpose has been achieved.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)