श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 41: अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र-प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.41.38 
तदिदं प्रतिगृह्णीष्व अन्तर्धानं प्रियं मम।
ओजस्तेजोद्युतिकरं प्रस्वापनमरातिनुत्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
'यह मेरा परम प्रिय अस्त्र है जिसका नाम अन्तर्धान है। इसे स्वीकार करो। यह शक्ति, तेज और कांति देने वाला है, शत्रु सेना को सुला देता है और समस्त शत्रुओं का नाश करने वाला है।' 38.
 
'This is my most beloved weapon called Antardhan. Accept it. It is the one that gives energy, brilliance and radiance, puts the enemy army to sleep and destroys all enemies. 38.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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