श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 41: अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र-प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना  »  श्लोक 35-36
 
 
श्लोक  3.41.35-36 
सव्यसाचिन् महाबाहो पूर्वदेव सनातन।
सहास्माभिर्भवाञ्छ्रान्त: पुराकल्पेषु नित्यश:॥ ३५॥
दर्शनात् ते त्विदं दिव्यं प्रदिशामि नरर्षभ।
अमनुष्यान् महाबाहो दुर्जयानपि जेष्यसि॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
'सव्यसाचिन! महाबाहो! पुरातन देव! सनातन पुरुष! पूर्व कल्पों में तुमने मेरे साथ तपस्या करके सदैव परिश्रम किया है। पुरुषोत्तम! आज मैं तुम्हें देखकर यह दिव्यास्त्र प्रदान कर रहा हूँ। महाबाहो! इससे तुम दुर्गम मानवेतर प्राणियों पर भी विजय प्राप्त कर सकोगे।' 35-36
 
‘Savyasachin! Mighty-armed! Ancient god! Eternal man! In the previous kalpas you have always toiled with me by performing penance. Best of men! Today, seeing you, I am giving you this divine weapon. Mighty-armed! With this you will conquer even the difficult to conquer non-human creatures. 35-36.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd