श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 41: अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र-प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.41.31 
तस्मादिमान् महासत्त्व मत्प्रसादसमुत्थितान्।
गृहाण न हि ते मुच्येदन्तकोऽप्याततायिन:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
अतः हे पराक्रमी पार्थ! मेरी कृपा से प्रकट हुए इन पाशों को स्वीकार करो। यदि तुम इनसे प्रहार करोगे, तो मृत्यु भी तुम्हारे हाथों से नहीं बच सकेगी॥31॥
 
‘Therefore, O mighty Partha! Accept these nooses that have appeared by my grace. If you attack with these, even death will not escape from your hands.॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)