श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 41: अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र-प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.41.26 
वैशम्पायन उवाच
प्रतिजग्राह तत् पार्थो विधिवत् कुरुनन्दन:।
समन्त्रं सोपचारं च समोक्षविनिवर्तनम्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! कुरुनन्दन कुन्तीकुमार अर्जुन ने उचित मन्त्र, उपचार, प्रयोग तथा निष्कर्ष के साथ उस अस्त्र को स्वीकार किया। 26॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Kurunandan Kuntikumar Arjun accepted that weapon with proper mantra, treatment, experiment and conclusion. 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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