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mahabharat 3.41.14-15: उसके सिर पर श्वेत छत्र था, जिससे वह श्वेत बादलों से आच्छादित चन्द्रमा के समान शोभायमान हो रहा था। अनेक तपस्वी ऋषि और गन्धर्व उसकी स्तुति करते थे। वह उस पर्वत की चोटी पर आकर रुक गया, मानो वहाँ सूर्य प्रकट हो गया हो॥14-15॥   |   mahabharat अध्याय 3.41: अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र-प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 41: अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र-प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  3.41.14-15 
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि।
शुशुभे तारकाराज: सितमभ्रमिव स्थित:॥ १४॥
संस्तूयमानो गन्धर्वैर्ऋषिभिश्च तपोधनै:।
शृङ्गं गिरे: समासाद्य तस्थौ सूर्य इवोदित:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उसके सिर पर श्वेत छत्र था, जिससे वह श्वेत बादलों से आच्छादित चन्द्रमा के समान शोभायमान हो रहा था। अनेक तपस्वी ऋषि और गन्धर्व उसकी स्तुति करते थे। वह उस पर्वत की चोटी पर आकर रुक गया, मानो वहाँ सूर्य प्रकट हो गया हो॥14-15॥
 
A white umbrella was held over his head, which made him look beautiful like the moon covered with white clouds. Many ascetic sages and Gandharvas used to praise him. He came and stopped at the peak of that mountain, as if the Sun had appeared there.॥ 14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)