श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 40: भगवान् शंकरका अर्जुनको वरदान देकर अपने धामको प्रस्थान  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.40.5 
तूणौ चाप्यक्षयौ भूयस्तव पार्थ यथोचितौ।
भविष्यति शरीरं च नीरुजं कुरुनन्दन॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुपुत्र! और ये रहे आपके दो अक्षय तरकश, जो आपके सर्वथा उपयुक्त हैं। हे कुन्तीपुत्र! आपके शरीर के सभी घाव ठीक हो जाएँगे और आप स्वस्थ हो जाएँगे।॥5॥
 
O son of Kuru! And here are your two inexhaustible quivers, which are completely suitable for you. O son of Kunti! All the injuries on your body will be cured and you will become healthy. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)