श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 40: भगवान् शंकरका अर्जुनको वरदान देकर अपने धामको प्रस्थान  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.40.4 
तदेतदेव गाण्डीवं तव पार्थ करोचितम्।
मायामास्थाय यद् ग्रस्तं मया पुरुषसत्तम॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषोत्तम पार्थ! यह वही गाण्डीव धनुष है जो आपके हाथ में रखने योग्य है, जिसे मैंने माया का आश्रय लेकर अपने में विलीन कर लिया था॥4॥
 
O great man Partha! This is the same Gandiva bow which is worthy of being in your hand, which I had merged within myself by taking shelter of Maya. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)