श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 40: भगवान् शंकरका अर्जुनको वरदान देकर अपने धामको प्रस्थान  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.40.19 
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा त्वरित: पार्थ: शुचिर्भूत्वा समाहित:।
उपसंगम्य विश्वेशमधीष्वेत्यथ सोऽब्रवीत्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! यह सुनकर कुन्तीपुत्र अर्जुन तुरन्त ही शुद्ध और एकाग्रचित्त होकर शिष्यत्व की इच्छा से भगवान विश्वेश्वर के पास गया और बोला - 'प्रभो ! मुझे इस पाशुपतास्त्र की शिक्षा दीजिए ॥19॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Hearing this, Kunti's son Arjun immediately became pure and concentrated and went to Lord Vishveshwar with the intention of being a disciple and said - 'Lord! Teach me this Pashupatastra. 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)