vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 40: भगवान् शंकरका अर्जुनको वरदान देकर अपने धामको प्रस्थान
»
श्लोक 15
श्लोक
3.40.15
भव उवाच
ददामि तेऽस्त्रं दयितमहं पाशुपतं विभो।
समर्थो धारणे मोक्षे संहारे चासि पाण्डव॥ १५॥
अनुवाद
महादेवजी बोले- हे महाबली पाण्डुपुत्र! मैं तुम्हें अपना परम प्रिय पाशुपतास्त्र देता हूँ। तुम इसे धारण करने, चलाने और समाप्त करने में समर्थ हो।॥15॥
Mahadevji said- O mighty son of Pandu! I give you my most beloved Pashupatastra. You are capable of holding it, using it and ending it.॥ 15॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×