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mahabharat 3.40.15: महादेवजी बोले- हे महाबली पाण्डुपुत्र! मैं तुम्हें अपना परम प्रिय पाशुपतास्त्र देता हूँ। तुम इसे धारण करने, चलाने और समाप्त करने में समर्थ हो।॥15॥   |   mahabharat अध्याय 3.40: भगवान् शंकरका अर्जुनको वरदान देकर अपने धामको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 40: भगवान् शंकरका अर्जुनको वरदान देकर अपने धामको प्रस्थान  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.40.15 
भव उवाच
ददामि तेऽस्त्रं दयितमहं पाशुपतं विभो।
समर्थो धारणे मोक्षे संहारे चासि पाण्डव॥ १५॥
 
 
अनुवाद
महादेवजी बोले- हे महाबली पाण्डुपुत्र! मैं तुम्हें अपना परम प्रिय पाशुपतास्त्र देता हूँ। तुम इसे धारण करने, चलाने और समाप्त करने में समर्थ हो।॥15॥
 
Mahadevji said- O mighty son of Pandu! I give you my most beloved Pashupatastra. You are capable of holding it, using it and ending it.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)